स्वामी विवेकानंद ने मानव सभ्यता के इतिहास पर अमिट छाप छोड़ीः आशुतोष महाराज

देहरादून। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के संस्थापक एवं संचालक आशुतोष महाराज ने कहा कि स्वामी विवेकानंद- माँ भारती का एक ऐसा सपूत थे जो इस ग्रह मंडल पर सिर्फ 39 वर्ष जीये, लेकिन मानव सभ्यता के इतिहास पर एक अमिट छाप छोड़ गये। जो एक युवा बनकर जीया और ’युवा’ रूप में ही समाधिस्थ हो गया। जो विश्व भर के नौजवानों के लिए ’नौजवानी’ की धड़कन बना! ‘विश्व धर्म सम्मेलन’ में जिसकी हाज़िरी ने दुनिया भर को झंझोड़ डाला था। हाँ, ऐसा ही था-वह अद्भुत युवा संन्यासी-स्वामी विवेकानंद। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे-‘यदि मैंने कभी एक भी हितकारी वचन बोला या कर्म किया, तो उसके वास्तविक स्रोत मेरे ठाकुर, मेरे गुरुदेव ही हैं।’ इसलिए विवेकानंद बनने की ओर पहला चरण है- ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’- उठो! जागो!… और एक पूर्ण महापुरुष को गुरुदेव के रूप में प्राप्त करो!
सन 1886 में ठाकुर के देहावसान के बाद स्वामी विवेकानंद व उनके गुरु-भाइयों के जीवन ने एक करवट ली। अत्यंत कठिन दौर उनके जीवन में आया। अभाव की इस स्थिति में भी उनके पास कुछ अनमोल था। वह था, अपने गुरुदेव के ज्ञान को विश्व की कगार तक पहुँचाने का जज़्बा! यही कारण है कि इन शिष्यों ने विपरीत परिस्थितियों के बीच रहकर प्रचंड साधना और अध्ययन किया। स्वयं का बौद्धिक और आध्यात्मिक निर्माण कर ये सभी अपने ठाकुर के मिशन की नींव के पत्थर बन गए। अतः विवेकानंद बनने का दूसरा सूत्र है- संघर्ष और साधना!
सन 1888 के आसपास भेलूपुर, वाराणसी में स्थित दुर्गा मंदिर में एक ऐसी घटना घटी, जिसने स्वामी विवेकानंद जी को जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पाठ पढ़ाया। स्वामी जी मंदिर के परिसर में थे, जब उन्हें बंदरों के झुंड ने घेर लिया। भय के मारे स्वामी जी भागने लगे। वानर और अधिक उद्दंड हो गए व गुर्राते हुए स्वामी जी के पीछे पड़ गए। इतने में एक संन्यासी ने ऊँची आवाज़ में पुकारते हुए स्वामी जी को हिदायत दी ‘अरे रुको! डरो नहीं! वानरों की आँखों में आँखें डाल कर स्थिर खड़े रहो। उनका सामना करो।’ स्वामी जी ने हिदायत का पालन किया और पाया कि वानर भाग खड़े हुए। अतः विवेकानंद बनने का तीसरा सूत्र है- हिम्मत! साहस! डटे रहने का जज़्बा!




