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अपना ‘वर्तमान’ गुरु को देकर शिष्य अपना ‘भविष्य’ संवार सकताः जाह्नवी भारती

देहरादून। दिव्य गुरु आशुतोष महाराज की छत्रछाया में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा अपने निरंजनपुर स्थित आश्रम सभागार में साप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम का दिव्य आयोजन किया गया। मनभावन भजनों की प्रस्तुति देते हुए इस रविवारीय कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। भजनों में छुपे गूढ़ आध्यात्मिक तथ्यों की सटीक विवेचना करते हुए मंच का संचालन साध्वी विदुषी भागीरथी भारती जी के द्वारा किया गया। उन्होंने बताया कि ईश्वर का पवित्र नाम जीव के भीतर भक्ति, सर्मपण, दृढ़ता, पावनता और सकारात्मक सदविचारों का ही पसारा किया करता है। संसार में जब-जब महापुरूषों का आगमन हुआ तो उनके उत्कृष्ट तथा महान विचारों ने ही उन्हें समाज में महानतम दर्जा प्रदान किया। इंसान के विचार उसे ही मात्र समग्र रूप से संचालित नहीं किया करते बल्कि! समाज को भी उन्हीं विचारों के द्वारा दिशा भी प्रदान करते जाते हैं। साधकों-भक्तों को यदि सत्संग सप्ताह भर न मिले तो वे स्वाभाविक रूप से बेचैनी महसूस करते हैं। यही सत्संग यदि उन्हें महीनों न मिलें, वर्षों तक न मिलें तो निश्चित रूप से वे अपने भीतर विकारों, क्रोध, नकारात्मकता पूर्ण भावनाओं और भय, चिंता, संताप को घुसपैठ करने को आमंत्रित कर लेते हैं। फिर उनके द्वारा इन्हें यहां से निकाल पाना एक असम्भव, एक दुरूह कार्य बन जाता है। यह ठीक एैसा ही है कि उपजाऊ जमघ्ीन में यदि नियम पूर्वक खेती न की जाती रहे तो खरपतवार स्वतः ही पैदा हो जाती हैं और किसान को इन्हें उखाड़ फेंकने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। इसीलिए महापुरूषों ने सत्संग को जीवन में अति आवश्यक बताया ताकि मनुष्य सदैव ईश्वरीय उच्च सदविचारों का ही संग किया करे और अपने जीवन का कल्याण कर पाए।
अपने आज के सत्संग प्रवाह में दिव्य गुरू आशुतोष महाराज की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की प्रचारिका साध्वी विदुषी जाह्नवी भारती ने प्रवचन करते हुए कहा कि संसार में अपने माता-पिता की सेवा करते हुए उनका नाम रोशन करना संतान का कर्तव्य है। लेकिन गुरू भक्ति के मार्ग में तो यह कार्य स्वयं गुरूदेव ही किया करते हैं। वे अपने शिष्य के माता और पिता, बन्धु और सखा बनकर अज्ञानता के अंधकार में डूबे अपने शिष्य का मार्ग रोशन किया करते हैं। कहा जाता है कि गुरू पूर्ण हों तभी शिष्य का परम कल्याण सम्भव है। पूर्णता की पहचान हमारे धर्म-ग्रन्थों में स्पष्ट दर्शायी गई है। पूर्ण गुरू वही है जो उस पूर्ण परमात्मा का पूर्ण साक्षात्कार, उनका दर्शन, उनसे मिलन और फिर ‘ब्रह्मज्ञान’ की सत्य सनातन दिव्य तकनीक से उनकी प्राप्ति भी करवा दें, उन्हें ही पूर्ण गुरू कहा जाता है। पूर्णता से पूर्णता में मिला देने वाली परम सत्ता ही कहलाते हैं ‘पूर्ण गुरू’।  एक शिष्य के जीवन में गुरू की भूमिका अद्वितीय भूमिका हुआ करती है। वे शिष्य का ‘नवनिर्माण’ किया करते हैं। जीव जब जगत में आता है तो मायावी जगत का रंग ही उस पर चढ़ने लगता है जबकि गुरूदेव ईश्वरीय मजीठ रंग में उसे पूर्ण रूप से रंग कर बुलंदियां प्रदान किया करते है। भक्ति रूपी कठिन ‘खंडे की धार’ वाले मार्ग पर गुरू शिष्य की उंगली पकड़कर उसे चलाते हैं। अपनी ‘अहैतुकी कृपा’ से ईश्वरीय धाम तक पहुंचाया करते हैं। यहां केवल शिष्य का समर्पण और उसका गुरू की आज्ञाकारिता में चलना ही उसे मंजिल तक पहुंचाता है। जो शिष्य अपना वर्तमान अपने गुरू को सौंप देता है तब गुरू उसका भविष्य सुनहरी स्याही से लिखा करते हैं। लोक तथा परलोक दोनों संवार दिया करते हैं। प्रसाद का वितरण करते हुए साप्ताहिक कार्यक्रम को विराम दिया गया।

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