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इस्लामिक सहयोग संगठन के दो दिवसीय सम्मेलन में भारत को विशेष अतिथि के रूप में बुलाने पर पाकिस्तान को लगी मिर्ची

नई दिल्‍ली। अबुधाबी में शुक्रवार से शुरू हुए इस्लामिक सहयोग संगठन के दो दिवसीय सम्मेलन में भारत को विशेष अतिथि के रूप में बुलाने पर पाकिस्तान को मिर्ची लगी है। लिहाजा इस संगठन के इस संस्थापक सदस्य ने इस बार बैठक का बहिष्कार किया है। आइए जानते हैं क्या है इस्लामिक सहयोग संगठन, क्यों हुआ इसका गठन और भारत को बुलाने के क्या हैं मायने।

पाकिस्तान की चाल 50 साल पहले भारत को सऊदी अरब के सुझाव पर इसके पहले सम्मेलन में आमंत्रित किया गया था। भारत का प्रतिनिधिमंडल सम्मेलन में शामिल होने गया लेकिन पाकिस्तान के विरोध के कारण उन्हें सम्मेलन में शामिल नहीं होने दिया गया। इसके बाद इस साल भारत को निमंत्रण मिला।

स्थापना  ओआइसी की स्थापना 1969 में हुई थी। इसके सदस्य देशों की संख्या 57 है, जिसमें से 40 मुस्लिम बहुल देश हैं। यूएन के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा संगठन है। पाकिस्तान इसके संस्थापक सदस्यों में शामिल है। इसका मुख्यालय सऊदी अरब के जेद्दा में है। यूएन और यूरोपीय यूनियन में यह स्थायी तौर पर प्रतिनिधिमंडल भेजता है। रूस और थाईलैंड जैसे देश भी इसके सदस्य हैं, जहां मुस्लिमों की संख्या ज्यादा नहीं है। जबकि मुस्लिम जनसंख्या के मामले में विश्व में तीसरे स्थान पर होने के बावजूद भारत इसका सदस्य नहीं है।

उद्देश्य  अंतरराष्ट्रीय शांति और सद्भावना को बढ़ावा देने के साथ ही मुस्लिम देशों के हितों की सुरक्षा करना और इसके लिए आवाज बुलंद करना इस संगठन का मकसद है। साथ ही सदस्य देशों में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक सहयोग बढ़ाना भी इसका लक्ष्य है।

बुलावे की वजह  पिछले कुछ समय से भारत के यूएई के साथ रिश्ते मजबूत हुए हैं। कतर ने भी 2002 में भारत के लिए पर्यवेक्षक के दर्जे का प्रस्ताव रखा था। पिछले साल बांग्लादेश व तुर्की ने भारत को संगठन का सदस्य बनाने को कहा था। संगठन के अधिकतर देशों के साथ भारत के रिश्ते मधुर हैं। यूएई भारत में निवेश कर रहा है और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में मददगार बना है।

भारतीय शिरकत के मायने  भारत उस समय संगठन की बैठक में शामिल हुआ, जब भारत और इसके सदस्य देश पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर है। पाकिस्तान ने भारत के निमंत्रण के विरोधस्वरूप सम्मेलन का बहिष्कार किया है। पाकिस्तान का यह कदम उसके खुद के लिए बड़ा झटका है जबकि मुस्लिम देशों के इस सबसे बड़े मंच से अपनी बात रखने का भारत के लिए सुनहरा अवसर है। इस निमंत्रण को भारतीय विदेश नीति और कूटनीति की सफलता ही कहा जाएगा कि मुस्लिम देशों में उसकी स्वीकार्यता बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में कमजोर पड़ने के साथ ही विश्व स्तर पर बदनाम हो रहे पाकिस्तान को ओआइसी के मौजूदा नेतृत्व से बदलते जमाने के साथ चलना सीखना चाहिए, लेकिन शायद उसने न सुधरने की ठान ली है। यदि ऐसा नहीं है तो फिर क्या कारण है कि वह एक ओर शांति का संदेश देने के लिए विंग कमांडर अभिनंदन को छोड़ने का फैसला करता है और दूसरी ओर ओआइसी में भारतीय विदेश मंत्री के संबोधन को सुनने के लिए तैयार नहीं होता? इससे यही पता चलता है कि पाकिस्तान भारत के प्रति अपने बैर को छोड़ने के लिए तैयार नहीं। इसीलिए उससे सतर्क रहना होगा।

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