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उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच हुए सिंगापुर सम्‍मेलन से शांति की खुली राह

नई दिल्‍ली। उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच इसी माह हुए सिंगापुर सम्‍मेलन से जो शांति की राह खुली है उसके दूर तक जाने की संभावना दिखाई देने लगी है। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि अमेरिका ने दक्षिण कोरिया से होने वाले युद्धाभ्‍यास को रद कर उत्तर कोरिया से दोस्‍ती की तरफ कदम बढ़ाने का साफ संकेत दिया है। गौरतलब है कि 12 जून को पहली बार दोनों देशों के राष्‍ट्राध्‍यक्षों के बीच मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात के बाद न सिर्फ दोनों नेताओं ने एक दूसरे की तारीफ की बल्कि कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु शस्‍त्र मुक्‍त करने पर भी सहमति बनी थी। इसके बाद उत्तर कोरिया ने अपनी एक और परमाणु साइट को तबाह कर दिया था। जिसके बाद यह साफ हो गया था कि उत्तर कोरिया अपने वादे को निभाने की तरफ आगे बढ़ रहा है।

युद्धाभ्‍यास को लेकर किम का डर  आपको बता दें कि इन दोनों देशों के बीच पहले भी कई बार युद्धाभ्‍यास किया गया है। विंटर ओलंपिक के बाद दक्षिण कोरिया और अमेरिका के बीच अब तक दो बार युद्धाभ्‍यास हो चुका है। इस दौरान उत्तर कोरिया की तरफ से सिंगापुर वार्ता रद करने की आशंका तक जताई जाने लगी थी। किम का मानना है कि इस तरह के युद्धाभ्‍यास उस पर हमले की तैयारी के लिए किए जाते रहे हैं। यही वजह है कि इनको लेकर उत्तर कोरिया हमेशा से ही चिंता व्‍यक्‍त करता रहा है। लेकिन अब जबकि अमेरिका ने आगामी युद्धाभ्‍यास को रद कर दिया है तो माना जा रहा है कि उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच खुली ये शांति की राह लंबी दूरी तय कर सकती है।

जानकारों की राय में एक अच्‍छा कदम  दोनों देशों की तरफ से अगस्त में होने वाले इस युद्धाभ्‍यास उलूची फ्रीडम गार्जियन (यूएफजी) को रद करने की पुष्टि करने के बाद जानकार इसको बेहतर कदम मान रहे हैं। दोनों देशों के अधिकारियों की तरफ से इसकी पुष्टि करते हुए कहा गया है कि उत्तर कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रयासों पर हो रही चर्चा के मद्देनजर यह फैसला लिया गया है। आपको यहां पर ये भी बता दें कि सिंगापुर वार्ता के बाद ही ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ इस तरह के सैन्‍याभ्यास पर विराम लगाने की योजना का खुलासा किया था। उल्ची फ्रीडम गार्डियन सैन्य अभ्यास में करीब 17,500 अमेरिकी सैनिक हिस्सा लेने वाले थे।

पिछले वर्ष भी किए गए थे इस तरह के युद्धाभ्‍यास  पिछले वर्ष अक्‍टूबर में भी दोनों देशों ने इसी तरह का अभ्‍यास किया था। उस वक्‍त किम ने अमेरिका को चेताते हुए यहां तक कहा था कि उसने जंगी जहाज उत्तर कोरिया की मिसाइलों की रेंज में हैं। इसके अलावा दिसंबर में भी दोनों देशों ने युद्धाभ्‍यास किया था। पांच दिवसीय इस युद्धाभ्‍यास में लड़ाकू विमानों समेत हजारों सैनिकों ने हिस्‍सा लिया था। इसको ‘विजिलेंट ऐस’ का नाम दिया गया था।

उत्तर कोरिया का आखिरी परमाणु परिक्षण  गौरतलब है कि सिंतबर 2017 में उत्तर कोरिया ने अब तक का आखिरी परमाणु परिक्षण किया था, जिसको उसने न सिर्फ सफल बताया था बल्कि इसके बाद उसने अपने को परमाणु शक्ति संपन्‍न राष्‍ट्र भी घोषित कर दिया था। इस परिक्षण के बाद अमेरिका की तरफ से उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध और कड़े कर दिए गए थे, जिसकी वजह से ही उत्तर कोरिया की अर्थव्‍यवस्‍था चरमरा गई थी। इन प्रतिबंधों के बाद ही किम अमेरिका से वार्ता के लिए तैयार भी हुए थे। लेकिन इन सभी के बीच अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच युद्धाभ्‍यास एक बड़ा रोड़ा बना हुआ था। उत्तर कोरिया से बढ़ते तनाव के मद्देनजर अमेरिका ने यहां पर अपना थाड मिसाइल सिस्‍टम तक लगा रखा था।

चीन और उत्तर कोरिया की जुगलबंदी  आपको यहां पर ये भी बता दें कि दक्षिण कोरिया और अमेरिका के बीच युद्धाभ्‍यासों को चीन भी पसंद नहीं करता है। यहां तक कि चीन को दक्षिण कोरिया में तैनात अमेरिकी थाड मिसाइल सिस्‍टम पर भी ऐतराज है। वहीं दूसरी तरफ चीन उत्तर कोरिया का सबसे करीबी देश है। यही वजह है कि सिंगापुर में अमेरिका से हुई वार्ता के बाद उत्तर कोरिया के प्रमुख किम जोंग उन ने 19 जून को चीन की आधिकारिक यात्रा की थी। इस दौरान दोनों देशों के बीच परमाणु निशस्‍त्रीकरण को लेकर भी एक समझौता हुआ था। आपको यहां पर ये भी बता दें कि इस वर्ष किम जोंग उन की यह तीसरी चीन यात्रा थी।

किम की चीन यात्रा  किम पहली बार मार्च में चीन गए थे और उस समय वह अपनी एक खास हथियारों से लैस ट्रेन से चीन पहुंचे थे। दो दिनों तक किम राजधानी बीजिंग में थे और यहां पर उन्‍होंने राष्‍ट्रपति जिनपिंग के साथ वार्ता की थी। दूसरी बार मई में किम, चीन की पोर्ट सिटी डालियान पहुंचे थे और यहां पर उन्‍होंने जिनपिंग के साथ भी कुछ समय बिताया था। विदेश मामलों के जानकार मानते हैं कि हाल के कुछ समय में किम ने नॉर्थ कोरिया की विदेश नीति में कुछ बदलाव किए हैं। हालांकि सिंगापुर वार्ता के बाद 19 जून को तीसरी बार किम ने ऐसे वक्‍त चीन की यात्रा की थी जब अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार बढ़ने की आशंका जताई जा रही थी।

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