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सुप्रीम कोर्ट: सरकार 4 हफ्ते में दाखिल करें नया हलफनामा

नई दिल्ली । लोकपाल की नियुक्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से दाखिल हलफनामें पर असंतुष्टि जाहिर की और मामले में चार हफ्तों में दूसरा हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया, जिससे साफ हो सके कि आखिर सरकार की ओर से लोकपाल की नियुक्ति को लेकर अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। मामले में केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि पीएम के नेतृत्व में लोकपाल की नियुक्ति के लिए सर्च पैनल गठित करने को लेकर एक बैठक हुई थी। लेकिन इसे अंतिम रुप नहीं दिया जा सका। सरकार की ओर से लोकपाल की नियुक्ति कब तक कर दी जाएंगी, ऐसी कोई समय सीमा तय नहीं की गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई कि पीएम के नेतृत्व में शीघ्र सर्च पैनल गठित कर लिया जाएगा, जिससे लोकपाल की नियुक्ति प्रक्रिया में तेज आएगी। कोर्ट ने संभावित लोकपाल के नामों की सूची उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। मामले की सुनवाई के दौरान वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट से कहा कि सरकार लोकपाल की नियुक्ति में अपने कदम पीछे खींच रही है। उन्होंने कोर्ट ने निवेदन किया कि वो लोकपाल की खुद नियुक्ति करे, क्योंकि यह एक विधायी जनादेश है और सरकार पिछले साढ़े चार सालों में इसे लागू करने में नाकाम रही है।

जानिए क्या है मामला ?

संसद में कानून बनने के बावजूद अभी तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट के बार-बार निर्देश देने के बावजूद लोकपाल गठन टलता रहा है। संप्रग सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान लोकपाल और लोकायुक्त बनाने की मांग केंद्र में रही। आखिरकार अन्ना हजारे के दबाव में संसद में कानून बन भी गया। लेकिन साढ़े चार साल बाद भी लोकपाल की संस्था वजूद में नहीं आ पाई है।

भ्रष्टाचार और कालेधन पर लगाम लगाने में मोदी सरकार ने जो तत्परता दिखाई, वो लोकपाल के मामले में नहीं दिखी। पहले तो कहा गया कि लोकपाल के चयन के लिए नेता प्रतिपक्ष की जरूरत है, जो मौजूदा सरकार में नहीं है। इसीलिए लोकपाल के गठन में दिक्कत आ रही है। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि लोकसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी यानी कांग्रेस के सदन में नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को नेता प्रतिपक्ष मानते हुए लोकपाल के गठन की प्रक्रिया पूरी की जाए। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद एक बार लोकपाल के चयन समिति की बैठक भी बुलाई गई, लेकिन किन्हीं कारणों से वह नहीं हो पाई।

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