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प्रधानमंत्री नरेन्द्रमोदी से 9 साल 9 सवाल पूछना चाहती है कांग्रेस:-जयराम नरेश

ए0आई0सी0सी0 दिल्ली। जयराम रमेश ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि साथियों, आज ही के दिन 9 साल पहले नरेन्‍द्र मोदी जी हमारे देश के प्रधानमंत्री बने, 9 साल बाद आज कांग्रेस पार्टी प्रधानमंत्री जी से 9 सवाल पूछ रही है, ये सवाल राहुल गांधी जी ने भारत जोड़ो यात्रा के समय पहले उठाए थे, बार-बार उठाते रहे हैं, कोई जवाब नहीं आया सरकार की ओर से, प्रधानमंत्री की ओर से और आज के दिन हम मजबूर हैं कि वही 9 सवाल हमें फिर से उठाने पड़ रहे हैं और हम चाहते हैं कि इन 9 सवालों पर प्रधानमंत्री अपनी चुप्‍पी तोड़ें। पहले ये डॉक्‍यूमेंट रिलीज करेंगे (डॉक्‍यूमेंट को हाथ में लेकर दिखाते हुए) और ये हैं ‘9 साल, 9 सवाल’, ‘9 साल, 9
सवाल’।
साथ‍ियों, जैसा कि मैंने कहा था कि बार-बार राहुल जी, भारत जोड़ो यात्रा के समय कन्‍याकुमारी से लेकर श्रीनगर तक सभी राज्‍यों में ये सवाल उठाते रहे, पर इसका जवाब नहीं आया सरकार की ओर से और खासतौर से प्रधानमंत्री की ओर से, क्‍योंकि ये सारे सवाल
प्रधानमंत्री से पूछे गए थे। मैं ये 9 सवाल अब गिनूंगा, दोहराऊंगा और यही मांग करूंगा कि इन 9 सवालों पर प्रधानमंत्री अपनी चुप्‍पी तोडे़ं।
पहला सवाल अर्थव्‍यवस्‍था से संबंधित है। हम लोग सब जानते हैं कि हमारा देश पीड़ि‍त है महंगाई से, बढ़ती हुई बेरोजगारी से, नोटबंदी से- पहली नोटबंदी, दूसरी नोटबंदी, गलत तरीके से जीएसटी लागू होने के बाद जो एमएसएमई खत्‍म किए गए हैं और इसका पूर्ण नतीजा आर्थिक विषमताओं पर हमें देखने को मिल रहा है। आर्थिक विषमताएं बढ़ती जा रही हैं। तो पहला सवाल हमारा अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है, ऐसा क्यों है, प्रधानमंत्री जी कि देश में महंगाई और बेरोजगारी आसमान छू रही है? क्‍यों अमीर वर्ग और अमीर हो रहे हैं और गरीब और गरीब हो रहे हैं? सार्वजनिक संपत्तियों को आप क्‍यों मित्रों को बेच रहे हैं, आर्थिक विषमताएं क्‍यों बढ़ रही हैं। तो ये पहला सवाल अर्थव्‍यवस्‍था से जुड़ा हुआ है और खासतौर से बढ़ती हुई आर्थिक विषमताओं के संबंध में है।

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दूसरा सवाल कृषि और किसान से संबंधित है, कृषि और किसान से जुड़ा हुआ है। ऐसा क्‍यों है प्रधानमंत्री जी कि पिछले 9 सालों में भी किसानों की आय दोगुनी नहीं हुई है, ये उनका वादा था, ये वादा अभी तक पूरा नहीं हो पाया। 3 काले कृषि कानूनों को रद्द करते समय किसान संगठनों के साथ हुए समझौतों को अभी तक लागू क्‍यों नहीं किया गया है, एमएसपी की गारण्‍टी क्‍यों नहीं दी गई? इस पर बहुत लंबी चर्चा हुई है पहले, किसान संगठनों के साथ सरकार की बातचीत हुई, संसद में भी इस पर बहस हुई, ये काले कानून पारित हुए, उसके बाद मजबूरी से प्रधानमंत्री को इन्हें वापस लेना पड़ा, तब के समय कुछ बातचीत हुई किसान संगठनों के साथ और आज भी रद्द करते वक्‍त जो वादे किए गए थे, जो गारण्‍टी दी गई थी, आज तक वो पूरे नहीं हुए हैं। तीसरा सवाल प्रधानमंत्री से। ये हम लोग ये तीसरा सवाल पिछले 3-4 महीने से हम कर रहे हैं, खासतौर से मित्रवादी पूंजीवाद की मिसाल जो हमें देखने को मिल रही है, रोज कुछ न कुछ
मोडानी कहानी जो हमें अखबारों में, टीवी में, मीडिया में, कई माध्‍यमों से हमें जानकारी मिलती रहती है। ऐसा क्‍यों है प्रधानमंत्री कि अडानी को फायदा पहुंचाने के लिए एलआईसी और एसबीआई में जमा जनता के खून-पसीने की कमाई को दांव पर लगा दिया गया है।
भ्रष्‍टाचार को खत्‍म करने की बात करने वाले प्रधानमंत्री इस पर जवाब क्‍यों नहीं देते कि अडानी की फर्जी कंपनियों में, शेल कंपनियों में 20,000 करोड़ रुपए किसके हैं? इस पर आप जानते हैं हमने 100 सवाल ‘हम अडानी के हैं कौन’ श्रृंखला में हमने 100 सवाल पूछे हैं, उसका एक भी जवाब नहीं आया है और अभी ये प्रचार किया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट से एक क्‍लीनचिट मिला है, ये बिल्‍कुल क्‍लीनचिट नहीं है ये भी साबित हो गया है और भी सवाल उठते हैं और खासतौर से ये फर्जी कंपनियों से जुड़े हुए हैं और ये 20,000 करोड़ रुपया किसका है?
चौथा सवाल भी राहुल जी ने बार-बार भारत जोड़ो यात्रा के समय उठाया था, हमने भी उठाए हैं, बार-बार हम उठाते रहते हैं। ये आंतरिक सुरक्षा से संबंधित हैं और खासतौर से चीन से जुड़ा हुआ है। जो 19 जून, 2020 को प्रधानमंत्री ने चीन को क्‍लीनचिट दे दी, उसकी वजह से हमें परेशानी भुगतनी पड़ी है और हमारा इस संबंध में सवाल है कि ऐसा क्‍यों है प्रधानमंत्री जी कि चीन को लाल आंख दिखाने की बात करने वाले आप, उनको 2020 में क्‍लीनचिट दे दी, जबकि वो आज भी हमारी जमीन पर कब्‍जा करके बैठा है।

     पांचवा सवाल – अभी आप देख रहे हैं मणिपुर में क्‍या हो रहा है, एक अभी नया मिसाल है और भी राज्‍यों में ध्रुवीकरण फैलाया जा रहा है, हिंसा फैलाई जा रही है, सामाजिक सद्भाव जो बिगड़ा है, सामाजिक सद्भावना जो बिगड़ी है उस पर ये सवाल है। ऐसा क्‍यों है
प्रधानमंत्री जी कि चुनावी फायदे के लिए जान-बूझकर बंटवारे की राजनीति को हवा दी जा रही है और समाज में डर का माहौल बनाया जा रहा है। एक तरफ राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ डर और धमकी और दूसरी तरफ समाज में अलग-अलग धर्म, अलग-अलग जाति, अलग-अलग प्रांत, अलग-अलग भाषा में बंटवारे की राजनीति का उपयो‍ग किया जा रहा है, अपने राजनीतिक मकसद के लिए।
छठा सवाल है हमारा सामाजिक न्‍याय के संदर्भ है। ऐसा क्‍यों है प्रधानमंत्री जी कि महिलाओं, आप देख रहे हैं जंतर-मंतर में। ऐसा क्‍यों है कि महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, ओबीसी और अल्‍पसंख्‍यकों के खिलाफ हो रहे अत्‍याचारों पर आप चुप रहते हैं, जातिगत
जनगणना, कास्‍ट सेंसस, वो जातिगत जनगणना की मांग को क्‍यों नजरअंदाज किया जा रहा है। कांग्रेस अध्‍यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे जी ने प्रधानमंत्री को भी खत लिखा है, उसका भी जवाब नहीं आया, राहुल जी ने बार-बार भारत जोड़ो यात्रा के समय इसकी मांग की, आप जानते हैं, जब यूपीए की सरकार थी, हमने जातिगत जनगणना की थी, पर बहुत से कारणवश मैंने आपको बताया है, वो प्रकाशित नहीं हो पाया और हमारी मांग है, अनेक विपक्ष पार्टियों की मांग है कि जातिगत जनगणना होना जरूरी है, पर अभी तक इस पर प्रधानमंत्री ने कुछ कहा नहीं है। लोकतांत्रिक संस्‍थाओं पर अगला सवाल है। ऐसा क्‍यों है प्रधानमंत्री जी कि विपक्षी दलों और नेताओं के खिलाफ बदले की भावना, प्रतिशोध की भावना से कार्रवाई की जा रही है, क्‍यों जनता द्वारा चुनी हुईं विपक्षी दलों की कई सरकारें गिराई गई हैं। पिछले 9 सालों में संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्‍थाओं को क्‍यों कमजोर किया जा रहा है? आठवां सवाल जनकल्‍याण की योजनाएं, मिसाल के तौर से महात्‍मा गांधी नरेगा। ऐसा क्‍यों है प्रधानमंत्री जी कि बजट में कटौती करके मनरेगा जैसी जनकल्‍याण की योजनाओं को कमजोर किया गया है, गरीब, आदिवासी एवं जरूरतमंदो के सपनों को क्‍यों कुचला जा रहा है।
हमारा अंतिम सवाल, प्रधानमंत्री को हम याद दिलाना चाहते हैं कोरोना मिसमैनेजमेंट, आज हम भूल गए हैं पर एक समय था, कोरोना महामारी से सारा देश पीड़ित था। ऐसा क्‍यों है, प्रधानमंत्री जी कि कोरोना के कारण और खासतौर से कोरोना मिसमैनेजमेंट के कारण, कुप्रबंध के कारण 40 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई, 40 लाख लोगों की मौत के बाद भी उनके परिवारों को मुआवजा देने से मना कर दिया गया, क्‍यों अचानक लॉकडाउन करके लाखों कामगार साथियों को घर जाने के लिए मजबूर किया गया और उन्‍हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया। तो साथ‍ियों, ये 9 सवाल हैं, ‘9 साल के 9 सवाल’, भारत जोड़ो यात्रा के 9 सवाल, राहुल जी के
9 सवाल, हमारे कांग्रेस अध्‍यक्ष के 9 सवाल, कांग्रेस पार्टी के 9 सवाल और देश की जनता के 9 सवाल तो ये 9 साल हैं, 9 सवाल हैं और खासतौर से प्रधानमंत्री को चुप्‍पी तोड़ने का अभी वक्‍त आ गया है और जरूरी है।

पवन खेड़ा ने कहा- आज दरअसल प्रधानमंत्री जी को माफी दिवस मनाना चाहिए। पिछले 9 साल का इनका लेखा-जोखा अभी जयराम रमेश जी ने आपके सामने रखा। इस लेखा-जेखा को अगर आप देखते हैं तो आज सिर्फ और सिर्फ ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ कहना चाहिए प्रधानमंत्री को। इसके अलावा कोई दो शब्द के अलावा तीसरा नहीं बोलना चाहिए। प्रत्येक हिंदुस्तानी से, प्रत्येक भारतीय से, जिसके साथ विश्वासघात हुआ, उससे वो माफी मांगे। जो अगर आप लोग नेटफ्लिक्स देखते हैं, फिक्शन नॉवेल पढ़ते हैं, तो लिखा हुआ आता है एक काल्पनिक, पिछले 9 साल में जितनी बातें इन्होंने की अपने घोषणा पत्र में की, अपने वायदों में की, अपने भाषणों में की, अपने मन की बात में की, तमाम बातें काल्पनिक थी, उनका हकीकत से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। मेरी और आपकी जिंदगी पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तो इसलिए हम उनसे मांग कर रहे हैं कि आज, जब हम आपसे पिछले 9 साल का हिसाब मांगते हैं, तो आप हमें 900 साल पीछे मत ले जाइए इतिहास में कि 900 साल पहले ये हुआ था, 800 साल पहले ये हुआ था, 700 साल पहले ये हुआ था, किसी को कोई रुचि नहीं इसमें। सब यह जानना चाहते हैं कि पिछले 9 साल में आपने क्या किया? जो पेट्रोल 60 रुपए लीटर आपको उस वक्त महंगा दिखता था, आज वो 100 में बेचते हुएvकहते हैं कि साहब श्रीलंका में देखो कितने में बिक रहा है, पाकिस्तान में देखो कितने में बिक रहा है। 400 रुपए का सिलेंडर यहाँ 1200 में बिकता है, तो आप पलटकर कहते हैं कि श्रीलंका में 2000 का बिक रहा है, पाकिस्तान में 2000 का बिक रहा है। ये स्तर बना दिया आपने मेरे देश का। इसलिए आपको माफी मांगनी चाहिए भारत से। किसानों की आय पर जयराम रमेश जी ने एक सवाल पूछा, दोगुनी छोड़ दीजिए, अब तो किसान कहते हैं जो उस वक्त थी ना, बस उतनी भर हमें वापस मिल जाए, तो वही बड़ी कृपा होगी। उतनी भी नहीं छोड़ी, जो 2014 से पहले मिलती थी, आप दोगुनी की बात करते हैं।
इसलिए हम कहते हैं कि काल्पनिक है आपकी हर बात।
कोरोना काल में हम सबने त्रासदियां देखी। ऑक्सीजन नहीं, साहब हजारों की भीड़ इकट्ठी करते थे, शाम को जूम कॉल पर मास्क लगाकर बैठ जाते थे। ये असलियत है इस सरकार की। असली चेहरा कुछ और, और जब वक्त आता है, तो मुखौटा। तो मुखौटे और चेहरे का जो द्वंध है, पिछले 9 साल में वही इस देश ने देखा, कुछ नया नहीं देखा। हम फिर से मांग करते हैं कि आज से लेकर 31 मई तक जितने भी आयोजन करें, माफी जरुर मांगे इस देश से, विश्वासघात के लिए, जो इस देश के साथ पिछले 9 साल में हुआ है। श्रीमती सुप्रिया श्रीनेत ने कहा मैं आर्थिक मुद्दे पर ही अपनी बात केंद्रित रखूंगी, क्योंकि आर्थिक बदहाली जो पिछले 9 साल में इस देश ने देखी है, वो त्रासदी बनकर उभरी है। क्योंकि 76 साल आजादी के बाद 9 साल एक अहम हिस्सा होता है उसका और उस अहम हिस्से में बेरोजगारी का, महंगाई का, भ्रष्टाचार का वो तांडव देखा है इस देश ने और जो छुपाने की कोशिश की है, वो वाकई त्रासदी है। आज असलियत ये है अगर सरकार की ओर से ही देख लीजिए। सरकार का सबसे बड़ा दावा क्या है, सीना ठोक कर बोलते हैं, हम यूके के आगे की इकोनॉमी बन गए हैं। दावा ये है, असलियत क्या है – यूके की एवरेज परचेजिंग पावर कैपेसिटी जो है, वो 50,000 डॉलर है। हमारी 7,000 डॉलर है। तो जब झूठ भी बोलते हैं, तो इतना लंबा बोल जाते हैं, कि अपने आप ही अपने बनाए हुए चक्रव्यूह में फंस जाते हैं। सीना ठोक कर अपना एक दावा और करते हैं 9 साल का, क्या कहते हैं कि हमने 86 करोड़ लोगों को फ्री का राशन बांटा। हां, क्योंकि आप हमारे देश को उस कगार पर ले आए कि भुखमरी, बेरोजगारी और महंगाई के चलते आपको वो बांटना पड़ा और अब लोगों की आंखे
खुल रही हैं क्योंकि गरीब देख रहा है कि आपने उसके साथ क्या-क्या धोखा किया है। लेकिन अगर निष्पक्ष तरीके से एक बात देख ली जाए कि जिस प्रधानमंत्री ने 9 साल पहले, आज के दिन प्रधानमंत्री बनने से पहले कहा था मैं 2 करोड़ रोजगार साल के दूंगा, अभी तक तो 19 करोड़ रोजगार बन जाने चाहिए थे। उस प्रधानमंत्री को 71 हजार वो चिट्ठियां बांटनी पड़ रही हैं, जो डाकिया घर लेकर जाता था। कहाँ 19 करोड़ रोजगार बनाने थे, कहाँ 71 हजार चिट्ठियां बांट रहे हैं। ये असलियत है इस सरकार की। इस सरकार की ये असलियत है कि कोरोना का एक भी केस आने से पहले इस देश की अर्थव्यवस्था 8.2 प्रतिशत से गिरकर 4.1 प्रतिशत पर आ गई थी और 45 साल की सबसे ज्यादा बेरोजगारी थी। इस सरकार की ये असलियत है कि इनकी नाक के नीचे से क्या वो ललित मोदी हों, क्या वो नीरव मोदी हों, क्या वो मेहुल चौकसी हो, क्या वो विजय माल्या हों, करोड़ों का चूना लगाकर, पैसा लेकर इस देश का भाग गए और ये सरकार कुछ नहीं कर पाई। आज भी हाथ पर हाथ धरे बैठी है। इस सरकार के भ्रष्टाचार का ये आलम है कि 11 लाख करोड़ बट्टे खाते में अमीर आदमियों के लिए डाल दिए गए, लेकिन किसानों की कर्जे माफी पर नाक, भौं सिकोड़ने लगते हैं। इनकी असलियत ये है कि 23 करोड़ लोग इस देश में गरीबी की रेखा के नीचे चले गए, जिन 27 करोड़ लोगों को हमने ऊपर उबारा था, 2004 से 2014 के बीच में। इस सरकार की ये असलियत है कि प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी जी क्या कहते थे – मित्रों रुपए की साख और प्रधानमंत्री की साख एक बराबर है, जैसे-जैसे रुपया गिरता है, प्रधानमंत्री की साख गिरती है। 53 रुपए पर मिला था, आज 83 पर है। कहते हैं कि हम सबसे सस्ता तेल मंगा रहे हैं, ले रहे हैं, खरीद रहे हैं रशिया से। तो महानुभाव हमारा पेट्रोल और डीजल का दाम सस्ता क्यों नहीं हो रहा? आखिरी बार दाम सस्ता कब हुआ था, ये देश की जनता जानना चाहती है। इस सरकार ने पढ़ाई महंगी कर दी, आटा महंगा कर
दिया, अस्पताल के बेड महंगा कर दिए, रेलवे की यात्रा महंगी कर दी और इसलिए मैं कहती हूं कि बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार का जो तांडव इस देश ने देखा है, वो वाकई में त्रासदी
है। कर्नाटक ने एक संदेश दिया और वो संदेश भाजपा ना पढ़ना चाहे तो हमारे लिए बहुत अच्छा है, लेकिन संदेश ये है और संदेश बड़ा है और एक के बाद एक नए-नए सर्वे आप लोगों के टीवी चैनल के माध्यम से सामने आ रहे हैं। इस देश के सामने मूलत: तीन समस्याएं हैं –
बेरोजगारी, महंगाई और निरंकुश भ्रष्टाचार। अडानी पर एक शब्द नहीं बोलेंगे, बेरोजगारी की बात करो तो पकौड़ा तलने की हिदायत देंगे। पकौड़ा भी तल लेंगे साहब लेकिन जो गैस का सिलेंडर 400 पर मिलता था, उसको भी आपने 1200 कर दिया है। आटे पर भी आपने जीएसटी लगा दिया है। सरसों के तेल को 90 से 250 पर पहुंचा दिया है और महंगाई की बात करो तो सरकार खड़े होकर कहती है कि हम तो जी लहसुन-प्याज ही नहीं खाते हैं। आप मत खाइए, लेकिन लोगों की थाली पर प्रहार मत करिए।
मेरा अपना मानना है कि इन सब बातों का जवाब मिलना जरुरी है और 9 साल में बाकी जो जयराम जी ने आपको संस्थाओं के बारे में बताया, जो पवन जी ने आपको माफी की बात की, बिल्कुल करना चाहिए। मेरा तो एक चैलेंज भी है और एक गुजारिश भी है कि महोत्सव मनाना चाहिए सरकार को 9 साल का। महोत्सव मनाना चाहिए अपनी नाकामी के 9 सालों का और लगे हाथ प्रधानमंत्री महोदय एक प्रेस वार्ता जरुर कर दें बिना टेलीप्रॉम्पटर के। कुछ सवाल ले लें, कुछ सवाल लेकर एक प्रेस वार्ता कर दें, तो हम चुप हो जाएंगे। लेकिन वो कर नहीं सकते, क्योंकि प्रधानमंत्री सवालों के जवाबों से भागते हैं और सवाल दिन-ब-दिन बढ़ते
जा रहे हैं।

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