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राफेल पर फैसले में टाइपिंग की त्रुटियों को दूर करने के लिए सरकार ने कोर्ट में दाखिल किया हलफनामा

नई दिल्ली। सरकार ने राफेल पर फैसले में टाइपिंग की त्रुटियों को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है। फैसले में राफेल डील पर सीएजी रिपोर्ट तैयार होने और उसे संसद की लोकलेखा समिति (पीएसी) के समक्ष रखे जाने का जिक्र है। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाते हुए सरकार पर सुप्रीम कोर्ट में गलतबयानी का आरोप लगाते हुए फैसले पर सवाल उठाया है। वैसे यह भी तय है कि सीएजी और पीएसी का जिक्र हटा भी दें तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार ने हलफनामे में बताया है कि राफेल की कीमत को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दी गई सील बंद लिफाफे में रिपोर्ट की लाइनों को समझने में गड़बड़ी के कारण सीएजी और पीएसी का विवाद खड़ा हुआ। सरकार के अनुसार सीलबंद लिफाफे में अदालत को बताया गया था कि राफेल की कीमत की पूरी जानकारी सीएजी को दे दी गई है और सामान्य प्रक्रिया के तहत सीएजी अपनी रिपोर्ट पीएसी को सौंपेगा, जहां उसकी पड़ताल की जाएगी। बाद में पीएसी की रिपोर्ट को सदन के पटल पर रखा जाएगा, जिसमें कीमत से संबंधित कुछ बातें सार्वजनिक भी होंगी। लेकिन फैसले को पढ़ने से यह लगता है कि सीएजी की रिपोर्ट पीएसी को सौंपी जा चुकी है और पीएसी ने उसे संसद के पटल पर रख भी दिया है। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। अभी तक सीएजी ने अपनी रिपोर्ट ही तैयार नहीं की। सरकार ने अदालत से कहा है कि अपने फैसले के पैरा 25 की दो पंक्तियों के लिखने में हुई त्रुटियों को दूर करे। ताकि राफेल पर किसी तरह की विवाद की गुंजाइश नहीं रहे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में टाइपिंग की गलतियों और किसी अन्य तरह की त्रुटि को दूर करने का कानूनी प्रावधान है। यदि अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया जाए, तो वह फैसले में संशोधन कर सकती है। सरकार ने इसी प्रावधान के तहत सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई है।

वहीं उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि फैसले से पैरा 25 को हटा दिया जाए यानी सीएजी और पीएसी का जिक्र नहीं भी किया जाए, तो मूल फैसले पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। फैसला राफेल डील से सभी आयामों का विस्तार से विश्लेषण के आधार पर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि राफेल डील की पूरी प्रक्रिया और कीमत तय करने के पारदर्शी तरीके से वह पूरी तरह संतुष्ट है और इसकी किसी जांच एजेंसी से जांच की जरूरत नहीं है।

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