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Lok Sabha Election 2019ः ऊधमपुर में बारामुला सीट के लिए इस बार कश्मीरी पंडितों के लिए बना खास बूथ,कश्मीरी पंडित पहले से ज्यादा उत्साहित

जम्‍मू। ऊधमपुर में बारामुला सीट के लिए इस बार कश्मीरी पंडितों के लिए खास बूथ बना है। कुछ परेशानियां जरूर हैं, पर इस बार सभी कश्मीर पंडित ने पहले से अधिक उत्साह के साथ मतदान के लिए एम फार्म और 12 सी फार्म भरेे हैं। विस्थापित कश्मीरी पंडित इस बार मतदान करने को लेकर उत्साहित हैं। कश्मीर के विस्थापित पंडित ने मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराया हैं। पुरानी सूची से नाम तलाश कर नई सूची में उन्हें शामिल किया गया। इसका मकसद उन कश्मीरी नेताओं को आईना दिखाना है जो आतंकियों की भाषा बोल रहे हैं। राज्य में रजिस्टर्ड कश्मीरी पंडित मतदाताओं की तादाद लगभग एक लाख से ऊपर है। यह तादाद दो से तीन लाख होती, इस समुदाय के लोगों ने वोट की अहमियत को समझा । इस बार तो लोग एम फार्म और 12 सी को भरने के बाद इस बात को सुनिश्चित कर रहे थे कि संबंधित मतदाता सूची में नाम, अभिभावक का नाम और गांव का नाम सही है कि नहीं। पिछली बार मैंने हब्बाकदल (श्रीनगर) और उसके साथ सटे इलाकों से विस्थापित पंडित मतदाताओं के लगभग नौ हजार एम फार्म और 12 सी फार्म भरवाए थे। जब डाटा फीडिंग शुरू हुई तो 4200 को डाटा फीडरों ने अपने स्तर पर ही खारिज कर दिया। उनके पास जो आंकड़े व जानकारी थी, वह एम फार्म से मेल नहीं खाती थी। सूची में नाम अगर रमेश कुमार था तो पिता का नाम इकबाल खान था। इसलिए, रमेश कुमार को मतदान से वंचित कर दिया गया था। विश्व कश्मीरी समाज नामक संगठन के संयोजक किरण वात्तल ने कहा कि मेरा वोट जम्मू में बना है। मेरे समुदाय से कई लोग ऐसे हैं जो इस बार ऊधमपुर, जम्मू, दिल्ली, चंडीगढ़ और मुंबई जैसे शहरों की मतदाता सूचियों से नाम हटवाकर कश्मीर स्थित अपने शहर व मुहल्ले की सूचियों में दर्ज करा लिये। विस्थापित पंडितों में से कइयों ने यह मान लिया है कि वे वापस नहीं जा सकेंगे। इसलिए, उन्होंने कश्मीर की मतदाता सूची से नाम हटवाते हए अन्य जगहों पर अपने वोट बनवाये। बारामुला-कुपवाड़ा में आज पहले चरण में मतदान हो रहा है। विस्थापित मतदाताओं के बारे में पूछने पर चुनाव अधिकारी ने कहा था कि करीब 10 हजार मतदाता बारामुला और बांडीपोर में हैं। 4675 लोगों के एम फार्म जमा हो चुके हैं। इस फार्म के जरिए हम संबंधित मतदाता सूची में उनका नाम शामिल करते थे। जम्मू में 4590, उधमुपर में 76 और दिल्ली में नौ विस्थापित पंडित मतदाताओं ने यह औपचारिकता पूरी कर ली थी। ऑनलाइन आवेदन भी आए हैं। मैं अपने स्तर पर नहीं कह रहा हूं, यहां जो स्थानीय अधिकारी इस प्रक्रिया के साथ बीते कई सालों से जुड़े हैं, वे कह रहे हैं कि यह बहुत ज्यादा है। पहले हजार-बारह सौ फार्म ही आते थे।

श्रीनगर और अनंतनाग सीट पर अहम भूमिका में  कश्मीरी पंडित श्रीनगर और अनंतनाग सीट पर काफी प्रभावी भूमिका अदा कर सकते हैं। खासकर घाटी में कम मतदान की स्थिति में ये वोट काफी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इन दोनों सीटों पर ही सबसे ज्यादा करीब 80 हजार विस्थापित पंडित मतदाता हैं।

कैसे डालेंगे वोट  जम्मू, उधमपुर और दिल्ली के रिलीफ कैंप में रह रहे कश्मीरी विस्थापित मतदाताओं के लिए विशेष मतदान केंद्र बनाए गए हैं। वे इन मतदान केंद्रों में आकर या पोस्टल बैलेट के जरिए अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए कश्मीर के विस्थापित मतदाताओं को एम फार्म या 12-सी फार्म भरकर स्वयं उपस्थित होकर निर्वाचन निबंधन पदाधिकारी को उपलब्ध कराया। निर्वाचन निबंधन पदाधिकारी इसकी जांच कर। संबंधित मतदाता के आवेदन को कश्मीर की संबंधित मतदाता सूची, जहां उसका नाम दर्ज है से मिलान किया गया । इस बार एम फार्म और 12-सी फार्म वे ऑनलाइन भी जमा हुए। इससे उनका काफी समय बचा।

बदल सकते हैं सूरतेहाल  घाटी में पाक परस्‍त आतंकियों ने तीन दशक पहले ऐसा खूनी खेल खेला कि उसका दंश आज भी हजारों परिवार झेल रहे हैं। करीब चार लाख लोगों को घर व संपत्ति सब छाेड़कर भागना पड़ा। तब से लालचौक से लेकर सुदूर दक्षिण भारत के चेन्नई तक की सियासत में कश्मीरी पंडितों का जिक्र अवश्‍य होता है। राष्ट्रीय दलों व क्षेत्रीय दलों के एजेंडे में उनकी कश्मीर वापसी और पुनर्वास का मुद्दा शामिल होता है। इसके बावजूद विस्थापित कश्मीरी पंडित और उनके मुद्दे हाशिए पर हैं। भले ही उन्‍हें मतदान का अधिकार दिया गया है लेकिन पेचिदगियाें ने इस अधिकार को अधिक प्रभावी नहीं होने दिया। घाटी की तीन लोकसभा सीटों पर विस्थापित कश्मीरी पंडितों के 10,4031 वोट हैं। यह सभी ट्रांजिट मतदान केंद्र पर या फिर पोस्टल बैलेट के जरिए मतदान करते हैं। तकनीकी और व्‍यावहारिक दिक्‍कतों के कारण 4 से 5 फीसद कश्मीर पंडित ही मताधिकार का इस्‍तेमाल कर पाते हैं। ऐसे में यह अधिक प्रभावी नहीं रहते। इस बार तकनीकी दिक्‍कतों का कुछ समाधान किया गया है और मतदान के लिए आवेदन की व्‍यवस्‍था चुनाव आयोग ने ऑनलाइन की है। चुनाव आयोग और सामाजिक संस्‍थाएं थोड़ा सजग रहें और उनकी चिंताओं का समाधान हो तो मतदान फीसद में काफी सुधार हो सकता है और यह खासकर कश्‍मीर की श्रीनगर व अनंतनाग सीट पर काफी प्रभावी भूमिका अदा कर सकते हैं। खासकर घाटी में कम मतदान की स्थिति में यह वोट काफी महत्‍वपूर्ण हो जाते हैं। इन दोनों सीटों पर ही सबसे ज्यादा करीब 80 हजार विस्थापित पंडित मतादाता हैं जबकि बारामुला -कुपवाड़ा संसदीय सीट पर 24 हजार। कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार आसिफ कुरैशी ने कहा कि वर्ष 1989 के पहले के हालात अलग थे। अगर यह कहें कि उस समय वोटरों के गिनती और मतदान के प्रतिशत में वह कहीं भी पूरी तरह निर्णायक नहीं थे, लेकिन आतंकी हिंसा के दौर में कश्मीर में जिस तरह से चुनाव बहिष्कार होता रहा है, विस्थापित पंडित सभी उम्मीदवारों के लिए अहम रहे हैं। हर दल का नेता और उम्मीदवार जम्मू, ऊधमपुर, दिल्ली में जहां भी विस्थापित कश्मीरी वोटर होते हैं, चक्कर लगाने जाता है। विस्थापित कश्मीरी वोटर फिर भी निर्णायक साबित नहीं हो रहा है, क्योंकि उसका मतदान प्रतिशत भी काफी कम रहता है। कई बार इससे भी बहुत कम और वह अलग अलग प्रत्याशियों के समर्थन में होता है।

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