Uttarakhandनीति-सन्देश

कृषि, समस्या और समाधान

पिछले चार महीनों से किसान भाई आंदोलन रत है। समस्या पूछो तो तीन कृषि बिल और कृषि बिल से हानि पूछो तो नही पता। बस तय कर लिया तो कर लिया। कहते है पंचों की बात सर माथे लेकिन पतनाला तो यहीं चलेगा। कोई कितना भी समाधान बताए लेकिन आंदोलन तो रहेगा। वास्तव में अगर गंभीरता से देखा जाय तो जो समस्याए रखी गयी है उनका वास्ता किसानो से न होकर चंद बिचोलयो से है। स्थिति स्पष्ट भी हो चुकी है जिससे आंदोलन दम तोड़ रहा है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि आम किसान परेशान है। कुछ समस्यायों के चलते कृषि से मोह भंग हो रहा है। आवश्यकता  इस बात की है कि उन मूलभूत समस्याओं का निदान हो जो इस व्यवसाय के प्रति उदासीनता पैदा कर रही है।आइये कुछ समस्याओं की चर्चा यहां करते है।
         खेती के लिए जो मूलभूत आवश्यकता है खेती हेतु जमीन, खेती के लिये बीज ,खाद और कृषि यंत्र तथा किसान और खेतिहर मजदूर। आइये सभी आवश्यकताओ पर एक एक करके बात करते है।
        खेती की जमीन वो स्थान है जहां से पैदावार ली जाती है। बढ़ते शहरीकरण और उद्योगिकरण के कारण इसकी उपलब्धता धीरे धीरे कम हो रही है। उसके बाद परिवारों के बंटवारे के कारण इसकी उपलब्धता प्रति व्यक्ति गुणात्मक रूप से कम होती जाती है। पहले अन्य रोजगार की कम उपलब्धता, शिक्षा की कमी के कारण किसान मजदूर मिलजुलकर खेती कर लिया करते थे। आवश्यकताए कम थी तो काम चल जाता था। लेकिन समय के साथ आवश्यकताए तो बढ़ी लेकिन प्रति व्यक्ति कृषि आय में उस अनुपात में व्रद्धि नही हुई। नतीजा असंतोष और दूसरे विकल्पों की तलाश। घटते क्षेत्रफल के लिये सरकार असहाय है लेकिन रोजगार के अन्य विकल्प बढ़ा कर इस समस्या से निपटा जा सकता है। सबसे पहले सरकार निश्चित करे कि एक छोटे परिवार के पूर्ण रोजगार के लिए कम से कम कितनी खेती की जमीन किस भौगोलिक क्षेत्र में आवश्यक है। उस से कम जमीन के किसानों को अतिरिक्त रोजगार उपलब्ध कराकर उसकी पूर्ति की जा सकती है। सहकारी तरीके से सामूहिक खेती, डेरी और कृषि उत्पादों के घरेलू निर्माण से भी समस्या का हल निकालने के प्रयास हो सकते है।
       आगे बढ़ते हुये बात करते है बीज, खाद और यंत्रों यानी कार्य करने हेतु पूंजी की। इस विषय मे यद्द्पि सरकार ने बहुत कुछ प्रयास किये है लेकिन बढ़ते ब्याज खर्च ने किसानों को आज भी दबा रखा है। उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा कर्ज की अदायगी में चला जाता है और कभी कभी तो उपज न होने अथवा कम होने पर कर्ज अदायगी भी  संभव नही होती जिसका नतीजा होता है मानसिक दबाव। सरकार ने इसके लिये जो भी संस्थाएं बनाई है कही न कही अपने लाभ के लिये काम करती है। सरकार को चाहिए कि एक राष्ट्रीय कृषि कोष बैंक की स्थापना करें जो किसानों को  उनकी भूमि के अनुपात में बिना ब्याज अथवा न्यूनतम ब्याज की लागत पर फसली ऋण उपलब्ध करे। इसके साथ ही किसानों का बैंक खाता केवल उसी बैंक में होना सुनिश्चित करे और उपज की बिक्री कही भी हो लेकिन उसका मूल्य केवल किसान के उसी बैंक खाते में जमा होना चाहिये। इससे ऋण की समय से अदायगी के साथ भविष्य में कृषि आय का भी सही आकलन हो सकेगा। एक से अधिक बैंकों तथा प्राइवेट संस्थाओं द्वारा ऋण प्रदान करने पर प्रतिबंध होना चाहिए। यहां अगर दूसरी आर्थिक परेशानियों का जिक्र न किया जाय तो बात अधूरी रह जायेगी। किसानों को आर्थिक समस्या उत्पन  करने में हमारी सामाजिक कुरीतियां भी कम जिम्मेदार नही है। विभिन्न अवसरों पर ग्राम भोज, कन्याओं की शादी में दहेज के खर्च, समय समय पर  हॉस्पिटल खर्च और मृत्यु भोज भी किसान की कमर तोड़ देता है। सरकार को चाहिए कि ऐसी सामाजिक कुरीतियो पर सख्ती के साथ रोक लगाए। कन्या की शादी के लिये किसी आर्थिक सहायता के साथ विवाह की सादगी भी सुनिश्चित करे। जब तक समाज के सम्पन्न लोग ऐसी कुरीतियां बन्द नहीं करेंगे तब तक गरीब किसान मजदूर मजबूरी में यों ही पिस्ते रहेंगे और उनकी बहू बेटियों पर अत्याचार भी खत्म नही होंगे। सरकार को कुरीतियो के खात्मे के लिये राष्ट्रीय स्तर पर सख्त कदम उठाने चाहिए और सामुहिक भोज पर कठोर नियम बनाने चाहिए। सामाजिक प्रतिष्ठा का यह प्रदर्शन किसी भी दृष्टि से उपयुक्त नही कहा जा सकता।
      अब चर्चा करते है उस धुरी की जो हमारी आर्थिकी औऱ आत्मनिर्भरता की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है। सभी विद्वानों ने यही कहा है कि देश को खुशहाल होना है तो देश के किसान को खुशहाल होना होगा। देश मे कृषि क्रांति तो आयी है लेकिन उसका मुख्यता लाभ बड़े किसानों को खुशहाल बनाने में हुआ है। आज देश के किसानों का मुख्यतः तीन वर्गों में विभाजन किया जा सकता है। पहले स्थान पर उपजाऊ जमीन के बड़े किसान है जो साधन संम्पन्न, पर्दे के पीछे व्यापारी और दबंग है। सरकार की अधिकतर योजनाओं का लाभ उठाने वाले और छोटे किसानों की जमीनें हथियाने वाले इन किसानों का  सरकार से भी तालमेल रहता है अतः उनके लिये कोई मूलभूत परेशानी नही है।
दूसरे स्थान पर मध्यम स्तर के मझोले किसान है जो जोड़तोड़ करके किसी तरह अपनी रोजी रोटी तो चला रहे है लेकिन आर्थिक आत्मनिर्भरता और संपन्नता अभी भी उनसे कोसों दूर है। ये वो लोग है जिन्हें सरकारी लाभ न्यूनतम स्तर पर मिल पाता है। आर्थिक स्तर पर कमजोर होने के बॉवजूद अगड़े कहे जाने वाले इन किसानों को सरकार कोई लाभ नही देती। इनको स्वास्थ्य, शिक्षा और नॉकरी में हमेशा पीछे खड़ा होना पड़ता है। कर्ज और सामाजिक बंधनो का बोझ इनकी गर्दन झुकाए रखता है।
       इस वर्ग में सरकारी प्रोत्साहन, प्रौद्योगिकी के प्रशिक्षण, सामूहिक अथवा करार पर खेती के प्रोत्साहन से उन्नति हो सकती है। कुरीतियो की मार भी इसी वर्ग पर अधिक पड़ती है इसलिए सरकार को इस वर्ग पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
देश मे सुविधाओ और अवसरों से सबसे अधिक वंचित यह वर्ग कृषि मजदूर कहलाता है जो हमेशा से कृषि मजदूरी पर निर्भर रहा है। इस वर्ग के पास या तो जमीन है ही नही और अगर थोड़ी है भी तो वह उसे रोजगार देने में सफल नही है। यह वर्ग हमेशा ही साधनों के लिये बड़े किसानों और सरकारी दान पर निर्भर रहता है। यही वर्ग हमारे राजनीतिग्यो के लिए भी सदा उपभोग की वस्तु रहा है। आज़ादी से आज तक बहुत से राजनीतिज्ञ, नीति निर्धारक और समाज के प्रणेता आये और इस वर्ग की गरीबी दूर करने के लुभावने वादे करके अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहे। जो कुछ प्रयास हुआ भी वो कल्याण का कम भ्रस्टाचार का रास्ता ज्यादा साबित हुआ। नतीजा गरीबो के उत्थान के नाम पर एकत्र सारा कोष  भृष्ट नेताओ और नॉकर शाही की भेंट चढ़ गया। इस बीच जो भी योजनाएं बनी उसका दूरगामी दुष्परिणाम भी इसी वर्ग और हमारी कृषि व्यवश्था को ही अन्य रूप में झेलना पडा।
       यह भी कहना गलत होगा कि सरकारों ने इस वर्ग के लिए कुछ नही किया। एक नजर इन प्रयासों पर भी डालना उचित होगा।
सरकार द्वारा मुफ्त स्वास्थ्य और शिक्षा देने से इस वर्ग के जीवन स्तर में काफी सुधार हुआ। घरों के निर्माण में सहायता ने भी जीवन को सुगम बनाने में भूमिका निभाई। शिक्षा तो मिली लेकिन अवसरों का लाभ जाति गत आधार पर होने के कारण अधिकतर उच्चतर लोगो को पहुंचा और गरीब वही बने रहे। अब उनके लिये हताशा की दोहरी मार पड़ी। शिक्षित होने पर न उंन्हे सेवा का अवसर मिला और न ही वे मजदूरी के योग्य बचे। नतीजा हताशा और पथभ्रष्टता। इसके बाद रही कसर सरकार के मुफ्त राशन और सब्सिडी ने पूरी कर दी। इससे भूखे पेट की पूर्ति तो हो गयी लेकिन उसके लिये  मेहनत मजदूरी करने की विवशता समाप्त हो गयी। इससे भी कृषि कार्यो में मेहनत करने की कृषि मजदूरों की परवर्ती पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।नतीजा सरकार पर सहायता का निरंतर दबाव। अब राजनीतिग्यो को भी शासन करना है जिसके लिये बार बार इसी वर्ग पर निर्भर रहना पड़ता है। तो सरकार बहुत अच्छी योजना लेकर आई इस वंचित वर्ग को न्यूनतम अवसर प्रदान करने के लिए। सरकार ने विभिन्न विकास योजनाएं आरम्भ कर इस वर्ग को न्यूनतम गारंटेड अवसर देते हुए प्रचलित मजदूरी से अधिक दर पर मज़दूरी का भुगतान शुरू कर दिया। फिर क्या छोटे से लक्ष्य वाले इस वर्ग की बल्ले बल्ले हो गयी।
मुफ्त का मकान, मुफ्त का राशन, मुफ्त की शिक्षा, मुफ्त का स्वास्थ्य और अवसरों में रिजर्वेशन के साथ न्यूनतम बीस दिनों के रोजगार की गारंटी। कौन बेवकूफ होगा कि कृषि मजदूरी करेगा। नतीजा फिर से नकारात्मक। कृषि क्षेत्र में मजदूरों की भारी किल्लत अथवा असहनीय कीमत से कृषि का घाटा बढ़ना शुरू हो गया और धीरे धीरे हमारे युवाओं में कृषि के प्रति रुझान लगभग शून्य के पास या मजबूरी का पर्याय बन गया है।
       देश को आत्मनिर्भर और खुशहाल बनाना है तो निश्चित रूप से हमे कृषि को लाभ प्रद और रोजगार परक बनाना ही होगा। ऐसा नही है कि सरकार चिंतित न हो या प्रयासरत न हो लेकिन तंत्र में कही तो कमी है कि लक्ष्यों की पूर्ति नही हो पा रही है। अवरोध तो हर मार्ग में आते है लेकिन उन्हें पार करते हुए ही लक्ष्य की और बढ़ना कर्मवीर का काम है। एक रास्ता दुर्गम है तो दूसरा विकल्प ढूंढना होगा नही तो रास्ते की बाधाओं को हटाना होगा। सरकार अगर खर्च किये जा रहे मुफ्त प्रसाद को कृषि उत्थान की और मोड़ दे, किसानों को सस्ती बिजली, खाद, बीज और यंत्र उपलब्ध कराए,कृषि मजदूरी में ,जमीन के प्रबंधन में सब्सिडी दे और सामूहिक खेती को क्लस्टर में परिवर्तित कर खेती को प्रोत्साहित करे और प्रत्येक क्लस्टर में कृषि उद्योग की स्थापना करेअवसरों की प्रकिर्य्या को तर्कसंगत रूप से परिवर्तित कर आर्थिक आधार पर लागू करे और उसके बाद कृषि योजनाओं को पारदर्शी और समान रूप से निर्भीक होकर किर्यान्वयन करे तो कृषि उपज की लागत घटेगी और उसी अनुसार देश को सस्ता अन्न प्राप्त होगा। कोई कारण नही कि हमारा किसान खुशहाल होकर देश को आत्मनिर्भर बनाने में अपनी अग्रणी भूमिका निभाएंगे। आंदोलन जीवियों को यही किसान कोई महत्व नही देगा। देश का असली किसान मेहनतकश था मेहनतकश है और मेहनतकश, प्रगतिवादी और देश का निर्माता बना रहेगा।किसान हमारी जड़ें हैं, हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। वे मजबूत होंगे तो देश भी शक्तिशाली बनेगा।
लेखक :-ललित मोहन शर्मा
चेयरमैन
बिल्ड इंडिया फोरम

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