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हर परिस्थिति में मोदी-शाह के साथ मजबूती से खड़े रहते थे अरूण जेटली, तीनों नेताओं के बीच आपसी सम्मान और विश्वास आखिर वक्त तक बना रहा

नई दिल्ली। भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली के निधन पर शोक जताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘उन्होंने अपना एक बहुमूल्य दोस्त खो दिया जिसके साथ-साथ वह जीवन के कई कदम चले।’ दूसरी तरफ केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के श्रद्धांजलि के ये शब्द कि ‘जेटली का निधन उनके लिए व्यक्तिगत क्षति है,’ बयां करते हैं कि लगभग दो दशक तक भाजपा के लिए सेनापति की तरह रहे जेटली-मोदी-शाह के बीच विश्वास और संबंध किस स्तर पर थे। महज पांच -छह वर्षो में दिल्ली की सियासत पर सितारे की तरह अंकित मोदी और शाह के साथ सबसे मजबूती से खड़ा होने वाला कोई एक व्यक्ति था तो वह जेटली थे। जब राष्ट्रीय राजनीति, यहां तक कि खुद भाजपा के अंदर एक कुनबा और मीडिया का भी एक बड़ा वर्ग नरेंद्र मोदी और अमित शाह को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश में जुटा था तो जेटली ने एक कवच तैयार किया था। इसके पीछे कोई ललक नहीं थी, बल्कि एक विश्वास था कि गर्दिश में खड़ी भाजपा को कोई खड़ा कर सकता है तो मोदी का करिश्मा और शाह की क्षमता। तीनों नेताओं के बीच आपसी सम्मान और विश्वास आखिर वक्त तक बना रहा। इस आपसी गठजोड़ का एक बड़ा कारण यह भी था कि तीनों नेता परिवारवाद से जुदा पूरी तरह भाजपा के लिए संकल्पित थे।

दिल्ली में मोदी के सबसे विश्वस्त प्रधानमंत्री मोदी और जेटली के बीच मजबूत गांठ शायद तभी बनने लगी थी जब मोदी संगठन मंत्री थे और जेटली संगठन में पदाधिकारी और फिर केंद्रीय मंत्री। यह और बात है कि दोनों नेताओं के स्वभाव अलग थे, लेकिन दोनों की एक खूबी थी -किसी भी विषय को जमीन तक जाकर और तर्को के साथ उसे समझना और समझाना। बाद में जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो दिल्ली में उनके सबसे विश्वस्त जेटली ही रहे।

मोदी के साथ था गजब का तालमेल गुजरात दंगे के बाद जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राजधर्म की बात कहकर मोदी के लिए संकट खड़ा किया तो दिल्ली में जिन कुछ लोगों ने मोदी के समर्थन में बात रखी थी उसमें जेटली शामिल थे। उसके बाद तो लंबे वक्त तक जेटली ही गुजरात के प्रभारी रहे और मोदी यही चाहते भी थे। गुजरात दंगे के वक्त जिस तरह मुख्यमंत्री के रूप में मोदी को घेरने की कोशिश हुई उसे जेटली लगातार तर्को के सहारे न सिर्फ ध्वस्त करते रहे, बल्कि बुद्धिजीवियों के बीच भी एक ऐसा वर्ग खड़ा किया जो कानूनी परख के साथ इसे स्वीकार कर सके।

मुखर होकर मोदी का किया था समर्थन 2013 में जब भाजपा का दिल्ली गैंग किसी भी तरह नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री दावेदारी को रोकने के लिए खड़ा था तो जेटली ऐसे कुछ चुने हुए नेता थे जिन्होंने मुखर होकर यह दावा किया कि भाजपा अगर सत्ता में आना चाहती है तो केवल मोदी के नेतृत्व में ही संभव है। यह मोदी के करिश्मे पर भरोसे का ही सबूत था कि पहली बार जेटली खुद लोकसभा चुनाव के लिए तैयार हुए थे।

 चुनाव हारने के बावजूद सरकार में बड़ी भूमिका हालांकि वह चुनाव हार गए, लेकिन जब मोदी सरकार बनी तो जेटली को वित्त के साथ-साथ रक्षा, कारपोरेट जैसे मंत्रालय देकर मोदी ने यह जताने में संकोच नहीं किया कि उन्हें जेटली की क्षमता पर भरोसा है। संवाद को लेकर मीडिया की ओर से दबाव बढ़ा तो जेटली ने ही मोदी को तैयार किया कि वह संवाद करें और खुद अपने आवास पर इसका आयोजन किया।

 प्रभारी रहते हुई भरोसे की शुरुआत जाहिर है कि मोदी के साथ तालमेल होगा तो उनके सेनापति रहे शाह नहीं छूट सकते। गुजरात में प्रभारी रहते वक्त ही शाह के साथ भी आपसी भरोसे की शुरुआत हुई थी और अपने स्वभाव के अनुरूप ही जेटली ने शाह की क्षमता को पहली नजर में पहचान लिया था। मोदी की तरह की शाह को भी सोहराबुद्दीन केस में फंसाने और बदनाम करने की कोशिश हुई थी तो जेटली हर कदम पर साथ खड़े थे, कानूनी दांव-पेच पर सलाह से लेकर नैतिक बल देने तक।

 शाह के लिए तैयार कराया अपना एक घर जब जांच के क्रम में ही सुप्रीम कोर्ट ने शाह को गुजरात छोड़ने का आदेश दिया तो जेटली ही थे जिन्होंने सबसे पहले दिल्ली में अपना एक घर उनके लिए तैयार करवा दिया। हालांकि शाह को इसकी जरूरत नहीं हुई, लेकिन भरोसे और सम्मान की जो नींव लगभग पंद्रह साल पहले गुजरात में पड़ी थी वह मजबूत होती चली गई।

तीनों के बीच था गहरा अपनत्व शाह ने जेटली के जाने को व्यक्तिगत क्षति बताया और जेटली के प्रति इस मोह का एक उदाहरण तभी मिल गया था जब जेटली अमृतसर से लोकसभा चुनाव हार गए थे। सामान्यतया बहुत सख्त शाह की आंखें भी तब छलक गई थीं। उनकी पत्नी भी रो पड़ी थीं। नेताओं के बीच यह अपनत्व राजनीति में सामान्य नहीं है, पर मोदी-शाह-जेटली के बीच यह अक्सर दिखा।

परस्पर एक दूसरे के लिए दिखा सम्मान प्रधानमंत्री होने के बावजूद हर मौके-बेमौके जेटली के आवास पर मोदी आते-जाते रहे। वहीं जेटली दूसरों के साथ अनौपचारिक बातचीत में भी मोदी को प्रधानमंत्री जी और शाह को अध्यक्ष जी के संबोधन से ही बुलाते रहे। जाहिर है कि जेटली का जाना जहां पूरी भाजपा के लिए बड़ा झटका है, मोदी-शाह के लिए एक दोस्त के जाने जैसा ही है।

अपने दोस्त के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थे मोदी दोस्ती की ऐसी मिसाल कम ही देखने को मिलती है कि जब जेटली को किडनी देने के लिए उनके परिवार का एक व्यक्ति राजी हुआ तो प्रधानमंत्री ने खुद उसे बुलाकर उससे बात की। दरअसल मोदी ने एक तरह से अपने दोस्त जेटली के लिए किडनी दान करने वाले को धन्यवाद दिया। जेटली के स्वास्थ्य के प्रति मोदी इस कदर चिंतित थे कि एम्स में जब जेटली भर्ती हुए तो मोदी ने यह खुद सुनिश्चित किया कि उनको वह कक्ष दिया जाए जो प्रधानमंत्री के लिए आरक्षित रहता है।

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