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चार साल, 23 राज्य और सिर्फ 2 में जीत पायी कांग्रेस

उत्तर-पूर्व के तीन राज्यों के रुझान आने के बाद देश में सत्तारूढ़ भाजपा में जहां खुशी की लहर है वहीं, कांग्रेस को अपने संगठन के बारे में एक बार फिर से सोचना होगा। बात राजनीति की है इस लिहाज से गंभीर चर्चा होनी चाहिए, देश में कांग्रेस की स्थिति भी गंभीर चिंता का विषय है। चार दिन की चांदनी, चार दिन की जिंदगी और चार राज्यों में कांग्रेस। ऐसी ही स्थिति हो गई है देशभर में कांग्रेस की। पिछले चार सालों की बात करें तो उत्तर-पूर्व के मौजूदा तीन राज्यों के चुनाव से पहले 23 राज्यों में चुनाव हुए, जिनमें से कांग्रेस के हाथ सिर्फ दो राज्य ही आए।

कांग्रेस मुक्त होता भारत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते रहे हैं। जैसे-जैसे वक्त गुजर रहा है, देशभर से कांग्रेस का सफाया होता जा रहा है। उत्तर-पूर्व के तीन राज्यों में चुनाव से पहले देश के पांच राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन जिस तरह से रुझान सामने आ रहे हैं उन्हें देखते हुए लगता नहीं कि कांग्रेस मेघालय में अपनी सरकार बचा पाएगी। अगर ऐसा होता है तो कांग्रेस के पास उत्तर भारत में पंजाब, दक्षिण भारत में कर्नाटक और पुदुच्चेरी व उत्तर पूर्व में मिजोरम के रूप में कुल चार राज्य रह जाएंगे। जिस तरह के रुझान दिख रहे हैं अगर अंतिम रिजल्ट भी वैसा ही रहता है तो मेघालय भी कांग्रेस के हाथ से फिसल सकता है।

भगवा रंग में रंग रहा देश
दूसरी तरफ अगर भाजपा की बात करें तो केंद्र में तो उसकी सरकार है ही। देश के 14 राज्यों में भाजपा की सरकार है और त्रिपुरा जीतने के बाद यह आंकड़ा 15 तक पहुंच जाएगा। इसके अलावा 4 राज्यों में भाजपा के समर्थन से सरकार चल रही है। फिलहाल अरुणाचल प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा की सरकारें हैं। वहीं आंध्र प्रदेश, बिहार, जम्मू और कश्मीर व सिक्किम इन चार राज्यों में भाजपा के समर्थन से राज्य सरकारें चल रही हैं।
कांग्रेस को अपने अंदर झांकने की जरूरत है?

यह प्रश्न किसी भी नेता या राजनीतिक जानकार से पूछेंगे तो इसका जवाब निश्चित तौर पर हां में होगा। यह हम इसलिए भी कह रहे हैं कि मिल रहे रुझानों के मुताबिक जिस त्रिपुरा में भाजपा शून्य से एक तिहाई बहुमत के आंकड़े तक पहुंच रही है वहीं कांग्रेस शून्य पर अटकी हुई है। नागालैंड से मिल रहे रुझानों में भी कांग्रेस सिर्फ दो सीटों तक सिमटती दिख रही है। जिस मेघालय में कांग्रेस अभी तक सरकार चला रही है, वहां भी वह सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद बहुमत के आंकड़े के काफी दूर है। कांग्रेस ऐसी पार्टी है जिसने लंबे समय तक देश और कई राज्यों में सरकारें चलायी हैं। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ 44 सीटों तक सिमटने के बाद अन्य राज्यों में भी कांग्रेस के सिमटने का सिलसिला जारी है। ऐसे में कांग्रेस को जरूर अपने अंदर झांकना होगा कि आखिर उसने ऐसी कौन सी गलतियां की हैं कि अब वह महज चार राज्यों में सिमटने को है।
23 में से सिर्फ दो चुनाव जीती कांग्रेस
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के केंद्रीय सत्ता से दूर होने के बाद एक-एक कर कई राज्य उसके हाथ से फिसल गए हैं। इसकी बानगी देखनी हो तो एक बार पिछले चार साल में हुए राज्यों के चुनावों पर एक नजर दौड़ाएं। इन चार सालों में कांग्रेस 2016 में पुदुच्चेरी और 2017 में पंजाब सिर्फ इन दो राज्यों में चुनाव जीत पायी है। जबकि बिहार में साल 2015 में चुनाव के समय जीत दर्ज करने वाले महागठबंधन का भी वह हिस्सा थी, लेकिन बाद में यह गठबंधन भी टूट गया। इस दौरान 23 राज्यों में चुनाव हुए जिनमें से अरुणाचल प्रदेश (2014), झारखंड (2014), महाराष्ट्र (2014), हरियाणा (2014), हिमाचल (2017), सिक्किम (2014), असम (2016), उत्तर प्रदेश (2017), उत्तराखंड (2017), गोवा (2017), गुजरात (2017), मणिपुर (2017) यानी कुल 12 राज्यों में भाजपा ने जीत दर्ज की। इनमें उत्तर पूर्व के तीन राज्य शामिल नहीं हैं, जिनकी शनिवार को मतगणना जारी है। इनके अलावा आंध्र प्रदेश में तेदपा-भाजपा गठबंधन ने 2014 में जीत दर्ज की, जबकि बिहार में महागठबंधन टूटने के बाद जेडीयू-भाजपा की सरकार चल रही है। यही नहीं 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद जम्मू-कश्मीर में भी पीडीपी और भाजपा मिलकर सरकार चला रहे हैं। इनके अलावा ओडिशा में 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजू जनता दल, 2016 में केरल में एडीएफ, तमिलनाडु में साल 2016 में एआईएडीएमके, तेलंगाना में साल 2014 में टीआरएस, 2016 में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने जीत दर्ज की।
इस बीच कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के हाथ से उनके बेटे राहुल गांधी के हाथ में आ गई। कांग्रेस अध्यक्ष भले ही बदल गया हो, लेकिन कांग्रेस की किस्मत बदलने का नाम नहीं ले रही। इस बीच सभी जानकारों का मानना है कि कांग्रेस को अपनी लगातार हारों की समीक्षा करनी चाहिए। हालांकि शनिवार को एक टीवी चैनल से बात करते हुए कांग्रेस प्रवक्ता मीम अफजल ने कहा कि उनकी पार्टी को 2014 से ही आत्म समीक्षा की बातें कही जाती रही हैं और पार्टी आत्म समीक्षा करती भी है। हालांकि पार्टी की लगातार हार के बाद कांग्रेस प्रवक्ता की समीक्षा की बात बेमानी लगती है। लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष की बड़ी जरूरत होता है। ऐसे में सिर्फ कांग्रेस ही है जो भाजपा के बढ़ते रथ को चुनौती दे सकती है, लेकिन इस पार्टी की कमजोरी कुछ और ही कहानी बयान कर रही है।

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